On world poetry day (March 21), bear with my indulgence.


Lansdowne and other such drugs.


कुछ ज़रा नाराज़ से लोग, फिर ज़रा धीमे से लोग 
दिन भर सपने पीते लोग,
रंग भरते, चिड़िया गिनते लोग,
उफ़ ये शायर किस्म के लोग।
 
किसी का सुकून, किसी का ग़म होकर देखिये,
किसी का ख्वाब, किसी का सोज़ होकर देखिये 
थोडा शायराना होकर देखिये।
 
कभी इश्क कभी इबादत - बहुत जिए दुनिया के ज़हर,
खुद से रंज़ींशों का लेकिन ज़ौक ही कुछ और है।
 
गहरा कभी कोई रिश्ता रहा होगा तुझसे,
वरना क्यूँ इस क़दर तेरा घर जलाया मैंने ज़ार- ज़ार।
 
जब भी उसके रंगीन दुप्पटों से रिस्ता पानी मेरे जीने पर बरसता था,
मैं थोडा और जिया करता था, थोडा खाख हुआ करता था।  
 
सारी रात माहताब के दीद को तरसती रही
और अब ये परिंदे आफ़ताब का मुज़्दा सुनाते हैं।


  

Comments

विलोम said…
I have read what I could, on your blog in the past half of an hour. Chance discoveries like these give life to what we call life. Happy to have stumbled. Write, write and write some more. Yes, they don't say "please" where I come from! :)
Astha Rawat said…
Bahut shukriya zarra nawazi ke liye aur apna aadha ghanta mere blog ko udhaar dene ke liye. Waqt aur sabr ki izzat kar sakun ye umeed khud se rakhti hun. Asha hai aapko niraash na kiya ho aur aage bhi na karun. By the way, sach mein aapka naam vilom hai? haha.
विलोम said…
(sheepish grin) नहीं, विलोम नाम से एक ब्लॉग लिखता हूँ. और हाँ, "आप" का प्रयोग अनुपयुक्त है, मैं उम्र और सोच दोनों में आपसे कमतर हूँ, उम्र के मामले में "शायद" :)
Astha Rawat said…
Vilom, koi kisi se kamtar nahin. umr mein 'shayad' ho lekin soch mein katai nahin. apne blog se tippani karte to main bhi padh leti aur ye baat aur bhi daave se kehti. :)
विलोम said…
Ye rahi mere blog se tippani. :)

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